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इस सुरंग के बनने के बाद यूरोप पूरी तरह बदल जाएगा | Fehmarnbelt

यह है वह तरीका जिसे आप अभी हमबर्ग से कोपेनगन तक ट्रैवल करते हैं। लेकिन इस नए रास्ते का क्या समुद्र के नीचे बन रही एक विशाल टनल इस पूरे सफर को बदलने वाली है और इसके बाद पूरे यूरोप की तस्वीर बदल जाएगी। आपका स्वागत है अभी निर्माणाधीन फेमरन बेल्ट फिक्स लिंक में। एक हैरान कर देने वाली बात। यह जो एक ही टनल दिखाई देती है, असल में यह कई अलग-अलग इंडिविजुअल एलिमेंट्स [संगीत] को जोड़कर बनाई गई है।

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इंजीनियरों को इन विशाल कंक्रीट एलिमेंट्स को स्ट्रैंड जैक्स की मदद से बेहद सटीकता के साथ समुद्र के भीतर नीचे उतारना पड़ा। अगर समुद्र की एक भी तेज धारा इन्हें जरा सा भी हिला देती, तो पूरा फैमान बेल्ट प्रोजेक्ट खतरे में पड़ सकता था। ऐसी स्थिति में इंजीनियरों को उस एलिमेंट को फिर से सीधा करना पड़ता है। लेकिन वे ऐसा सिर्फ पों से खींचकर कैसे कर लेते हैं? इंजीनियरों की यह शानदार ट्रिक देखिए। यह मोरिंग रोप समुद्र की तलटी ओशियन बेड में एंकर की गई है। क्या आप बता सकते हैं कि अगर इस रो को ऊपर की तरफ खींचा जाए तो क्या होगा? जब आप किसी रोप को खींचते हैं तो वह स्वाभाविक रूप से सीधी होने की कोशिश करती है और जैसे ही यह मोरिंग रोप सीधी होती है वैसे ही पूरा एलिमेंट भी अपने आप सीधा हो जाता है। कमाल है ना? इंजीनियर सच में बहुत स्मार्ट होते हैं। अगर आपको इसका एक्सपेरिमेंटल प्रूफ चाहिए [संगीत] तो बस इसे वर्टिकली ऊपर की तरफ खींच कर देखिए। वाह! एलिमेंट बिल्कुल [संगीत] जादू की तरह सीधा हो जाता है। यह ऊपर खींचने का काम फाउंट से जुड़े हुए स्ट्रैंड जैक की मदद से किया जाता है।

अगर आपको एलिमेंट को दाई तरफ मूव करना है तो दोनों गाइडेंस केबल्स को खींचना होगा। जैसे-जैसे यह केबल्स छोटी होती जाती है, एलिमेंट के पास दाई तरफ जाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचता। और अगर इसे दूसरी दिशा में ले जाना हो, तो बस दूसरी तरफ लगी केबल्स को एक्टिवेट कर दीजिए। इन गाइडेंस केबल्स का इस्तेमाल करके इंजीनियर इमर्शन प्रोसेस के दौरान एलिमेंट को पूरी तरह 2 डी मोबिलिटी दे पाते हैं। सिंपल है लेकिन इंजीनियरिंग का कमाल है।

अब आपके मन में यह सवाल आ सकता है कि अलग-अलग पीसेस से बने होने और समुद्र के भारी हाइड्रोस्टेटिक प्रेशर को झेलने के बावजूद यह टनल एलिमेंट्स लीक प्रूफ कैसे रहते हैं? इसका जवाब है इंजीनियरों द्वारा इस्तेमाल की गई एक बहुत ही क्लेवर टेक्निक में छिपा हुआ है। यह पहले से नीचे उतारा गया टनल एलिमेंट है। सबसे पहला काम होता है इस एलिमेंट को एक आरओवी की मदद से इंस्पेक्ट करना। अगर आरओवी को पता चलता है कि एलिमेंट के एडजेस पूरी तरह क्लीन नहीं है तो अंडर वाटर डवर्स का एक बहुत इंपॉर्टेंट काम होता है। उन्हें हाई प्रेशर वाटर जेट्स का इस्तेमाल करके टनल एलिमेंट्स के एडजेस को अच्छी तरह साफ करना पड़ता है।

ध्यान से देखिए। बहुत जल्द इन दोनों के बीच एक वाटर चेंबर बनने वाला है। सबसे पहले नए और पहले से लगाए गए टनल एलिमेंट के बीच पुलिंग जैक्स लगाए जाते हैं। अब इन पुलिंग जैक्स को एक्टिवेट किया जाता है जिससे दोनों एलिमेंट्स एक दूसरे के करीब आने लगते हैं। अब इस बड़े रबर सील पर खास ध्यान दीजिए जिसे जीना गास्केट कहा जाता है। जैसे ही पुलिंग जैक एक्टिवेट होता है जिन गास्केट दबने लगता है और एक शुरुआती वाटर टाइट सील बना देता है। अब आप देख सकते हैं कि दोनों एलिमेंट्स के बीच थोड़ा पानी फंस गया है जिससे एक वाटर कैविटी बन जाती है। इसके बाद इंजीनियर इस पानी को बाहर पंप कर देते हैं। अब बताइए आगे क्या होगा? इस चेंबर के अंदर का प्रेशर नेगेटिव हो जाएगा। बाहर का ज्यादा प्रेशर अपने आप इन एलिमेंट्स को और मजबूती से एक दूसरे से जोड़ देगा। [संगीत] यानी बिना किसी एक्सटर्नल मशीन के एलिमेंट्स के बीच एक ऑटोमेटिक बॉन्डिंग हो जाती है।

अब समय है इन एलिमेंट्स को परमानेंटली बॉन्ड करने का। नेगेटिव प्रेशर को बनाए रखते हुए वर्कर सबसे पहले जॉइंट पर ओमेगा सील्स इंस्टॉल करते हैं। इसके बाद जॉइंट वाले रीजन को कॉनंक्रीट डालकर हमेशा के लिए सील कर दिया जाता है। अब वे बल्क हेड्स को हटा सकते हैं और अंदर का प्रेशर वापस नॉर्मल हो जाता है।

अब सबसे बड़ा सवाल आता है वर्कर्स बल्क हेड चेंबर के अंदर जाकर ओमेगा सील का काम कैसे करते हैं? क्योंकि जैसे ही वे बस्केट का डोर खोलेंगे नेगेटिव प्रेशर खत्म हो जाएगा और एलिमेंट्स फिर से लूज हो सकते हैं। लेकिन असल में ऐसा नहीं होता क्योंकि यहां हम एक इंपॉर्टेंट पॉइंट भूल रहे हैं। फेहमान बेल्ट के नीचे पानी का प्रेशर लगभग एटमॉस्फेरिक प्रेशर से पांच गुना ज्यादा है। वहीं इटनल एलिमेंट के अंदर का प्रेशर हमेशा एक एटमॉस्फेरिक प्रेशर पर रखा जाता है। ताकि यहां काम करने वाले लोगों को कोई परेशानी ना हो। इसका मतलब यह है कि अगर बल्क हेड्स के बीच का प्रेशर बढ़कर एक बार भी हो जाए तब भी यह बाहर के पानी के प्रेशर से कम रहेगा। इसी वजह से जॉइंट अपनी जगह पर मजबूती से बना रहता है।

फेमन बिल्ट प्रोजेक्ट में एक बहुत ही इंटरेस्टिंग इनोवेशन है। कोच टनल एलिमेंट्स में डबल डेकर ज्योमेट्री का इस्तेमाल किया गया है। क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ऐसा क्यों किया गया? इसका निचला डेक ट्रैफिक के लिए नहीं है। इसे सिर्फ मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट जैसे ट्रांसफॉर्मर्स, स्विच गियर और पंप्स के लिए इस्तेमाल किया जाता है। फहममान बेल्ट प्रोजेक्ट में ऐसे 10 एलिमेंट्स हैं जिन्हें स्पेशल एलिमेंट्स कहा जाता है। यह स्पेशल एलिमेंट्स थोड़े ज्यादा चौड़े होते हैं और इनमें एक ले बाय भी होता है। इसकी मदद से मेंटेनेंस स्क्रू अपनी व्हीकल को ले बाय में पार्क कर सकती है। बिना ट्रैफिक को डिस्टर्ब किए और इस डोर के जरिए नीचे वाले डेक में जा सकती है। संक्षेप में कहें तो कॉम्प्लेक्स मशीनरी को पूरी टनल में जगह-जगह फैलाने के बजाय इंजीनियरों ने उन्हें कुछ खास टनल एलिमेंट्स के अंदर जमीन के नीचे रखा है।

आप यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि 18 कि.मी. लंबी फेहमान बेल्ट टनल सिर्फ 89 टनल एलिमेंट्स से बनी है। इसका मतलब है कि हर एक एलिमेंट की लेंथ काफी ज्यादा होनी चाहिए। और हां, एक एलिमेंट की लंबाई लगभग 217 मीटर्स होती है।

टनल एलिमेंट्स के सिरों पर दिखाई देने वाले बलकेट्स असली हीरोज़ है। यह टेंपरेरी स्ट्रक्चर्स होते हैं। लेकिन इमर्शन प्रोसेस के दौरान यह सुनिश्चित करते हैं कि टनल एलिमेंट्स पूरी तरह लीक प्रूफ बने रहे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन विशाल बल्केड्स को हटाया कैसे जाता है? इंजीनियरों को इन बल्क हेड्स को नए टनल एलिमेंट्स के लिए दोबारा इस्तेमाल करना होता है। बल्क हेड्स को हटाने के लिए टनल को एंट्री और एग्जिट पोर्टल से एक्सेस मिलना जरूरी है। जब एलिमेंट प्लेसमेंट का काम इस स्टेज तक पहुंच जाता है तब एक इंटरेस्टिंग मशीन की एंट्री होती है बीएलआरटी।

यह मशीन एक पोर्टल के जरिए अंदर आती है। अब बीएएलआरटी अपने चारों लेग्स पर पूरी तरह स्टेबल हो जाती है। अब शुरू होता है असली मैजिक। अपने आर्म्स की मदद से यह मशीन एक बल्केड को उठाती है और उसे रोटेट करती है। यह रोटेशन बहुत इंपॉर्टेंट है। आप देख [संगीत] सकते हैं कि बल्के हेड पास वाले दूसरे बलके हेड से टकराता नहीं है। बीएलआरटी में इसे अचीव करने के लिए एक क्लेवर [संगीत] मैकेनिज्म लगाया गया है। यह मशीन बलके हेड को बीएलआरटी पर ही होल्ड करके भी रख सकती है। हटाए गए बलकेट्स को अब एक ट्रेलर पर रखा जाता है और ट्रेलर अपनी वापस जाने वाली जर्नी शुरू करता है। इस तरह धीरे-धीरे और सिस्टमैटिक तरीके से सभी बलकेट्स को रिमूव कर दिया जाता है।

अब आपके मन में यह सवाल आ सकता है कि यह 200 मीटर से ज्यादा लंबे कंक्रीट एलिमेंट्स बनाए कैसे जाते हैं? इन विशाल एलिमेंट्स की फैब्रिकेशन और फिर उनका ट्रांसपोर्टेशन ही असल में फहमान बेल्ट प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी इनोवेशन है।

फेम बेल्ट फिक्स्ड लिंक प्रोजेक्ट में अब तक बनाई गई सबसे बड़ी कास्टिंग फैसिलिटीज में से एक शामिल है। [संगीत] यह कास्टिंग फैसिलिटी डेनमार्क के लोलैंड आइलैंड पर रोब के पास स्थित है और यह लगभग 150 हेक्टेयर्स के विशाल आरिया में फैली हुई है जो [संगीत] करीब 300 फुटबॉल फील्ड्स के बराबर है।

एक टनल एलिमेंट में इस्तेमाल होने वाले रिबार्स [संगीत] की मात्रा भी हैरान कर देने वाली है। अगर इन सभी स्टील पीसेस की कुल लंबाई जोड़ी जाए तो यह लगभग 350 कि.मी. तक पहुंच जाती है।

यहां यूजेबल फॉर्म वर्क का इस्तेमाल [संगीत] किया जाता है और इन फॉर्म्स को सपोर्ट देने के लिए बहुत ज्यादा मात्रा में स्कार्फोल्डिंग और सपोर्ट स्ट्रक्चर्स की जरूरत होती है। कुछ फॉर्म्स तो हाइड्रोलिकली पावर्ड भी होते हैं। जब रिबार और फॉर्म अरेंजमेंट पूरा हो जाता है तो कैविटी के अंदर कंक्रीट डाला जाता है। इसके बाद इंजीनियर्स को कंक्रीट के क्योरिंग होने का इंतजार करना पड़ता है। क्योरिंग के बाद फॉर्म्स को हटाया जा सकता है।

अभी जो सेक्शन बनाया गया है उसकी लंबाई लगभग 24 मीटर है। लेकिन हमें पता है कि हर टनल एलिमेंट की लंबाई 217 मीटर होनी चाहिए। इसका तरीका यह है कि इस छोटे एलिमेंट को हाइड्रोलिक स्किडिंग सिस्टम की मदद से ट्रैक्स पर आगे की तरफ मूव किया जाता है। देखिए यह हाइड्रोलिक मशीन इस पुशिंग ऑपरेशन को करती है। जब एलिमेंट को एक सेक्शन की लंबाई जितना आगे बढ़ा दिया जाता है तो उसी जगह पर अगली कास्टिंग शुरू कर दी जाती है।

इस तरह कुल नौ फेस में एक पूरा टनल एलिमेंट तैयार किया जाता है। पूरी प्रोडक्शन प्रोसेस बड़े-बड़े क्लाइमेट कंट्रोल हॉल्स के अंदर होती है। इसका कारण यह है कि कंक्रीट की क्योरिंग प्रोसेस टेंपरेचर और ह्यूमिडिटी के लिए बहुत सेंसिटिव होती है। इतने स्ट्रिक्ट क्वालिटी मेजर्स की वजह से इन कंक्रीट एलिमेंट्स की लाइफ स्पैन लगभग 120 इयर्स तक सुनिश्चित की गई है। आप देख सकते हैं कि उन्होंने कंक्रीट एलिमेंट के अंदर बड़े-बड़े टैंक्स भी बनाए हैं। इनका पर्पस हम आगे समझेंगे।

मेरे पीछे इतनी भीड़ और सेलिब्रेशन क्यों हो रही है? आज 17 जून 2024 को रबीहवन फैक्ट्री में पहला टनल एलिमेंट पूरा हुआ है और इसका इनोगेशन डेनमार्क के किंग फ्रेडरिक एक्स द्वारा किया जा रहा है। आप राजा के पास एक टाइम कैप्सूल बॉक्स भी देख सकते हैं। इसे डेनिश साइड के एंट्रेंस के पास जमीन में दफन करने की योजना है। इस टाइम कैप्सूल में कई चीजें रखी गई है। जैसे किंग इमेज वाला एक कॉइन। लोकल बच्चों द्वारा बनाए गए ड्राइंग्स और पहले टनल एलिमेंट को बनाने वाले वर्कर्स के मैसेजेस। यह टनल एलिमेंट सच में बहुत विशाल है। है ना?

जब कंक्रीट पूरी तरह क्योर हो जाता है तो टनल एलिमेंट के दोनों सिरों को बल्क हेड लगाकर सील कर दिया जाता है। जब टनल एलिमेंट्स तैयार हो जाते हैं तो बेसिन को पास के वाटर वे से पानी भरकर फ्लड किया जाता है। यह बल्क हेड्स यह सुनिश्चित करते हैं कि टनल एलिमेंट के अंदर का हिस्सा ड्राई और एयर फील्ड बना रहता है। कंक्रीट सेगमेंट को इस तरह डिजाइन किया गया है कि जब यह पूरी तरह एयर टाइट हो जाता है तो यह पानी पर फ्लोट कर सके। यानी बोनसी प्रिंसिपल का शानदार इस्तेमाल किया गया है।

आपने ध्यान दिया होगा कि बेसिन में पानी भरने के साथ-साथ अंदर मौजूद बैलेंस टैंक्स को भी थोड़ा-थोड़ा भरा जाता है। इस प्रोसेस को ट्रिमिंग कहा जाता है। अगर ट्रिमिंग ना की जाए और सीधे बेसिन में पानी भर दिया जाए तो एलिमेंट पानी पर तैर तो जाएगा। लेकिन यह गारंटी नहीं होगी कि यह सीधा तैरेगा। लेकिन बैलेंस टैंक्स को सही मात्रा में भरने की इस क्लेवर टेक्निक से एलिमेंट पूरी तरह सीधा फ्लोट करता है और उतना ही पानी के अंदर डूबता है जितना जरूरी होता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि एक टनल एलिमेंट का वजन लगभग 73500 टन्स होता है। इन्हें रोड के जरिए ट्रांसपोर्ट करना संभव नहीं है। एक बार पानी में फ्लोट करने के बाद इन विशाल टनल एलिमेंट्स को टगब्स की मदद से बेसिन से बाहर खींच कर ले जाया जाता है। एलिमेंट की ऊपर वाली सरफेस पानी की सतह से सिर्फ 30 सेंटीमीटर ऊपर होती है। सबसे पहले इन एलिमेंट्स को वर्क हारबर तक टॉक किया जाता है।

वर्क हारबर में फेमरन बेल्ट का हीरो, आईवी टनल एलिमेंट्स का इंतजार कर रहा होता है। यह स्पेशली [संगीत] डिज़ कस्टम मेड पोंसंस हैं। जिन्हें खासतौर पर फेमरन बेल्ट प्रोजेक्ट के लिए बनाया गया है। सबसे पहला काम होता है एलिमेंट को आईवी के हवाले करना। [संगीत] अब समय है टनल एलिमेंट के अगले बैलेंस टैंक को रिवील करने का। यह है कॉनंक्रीट बैलेंस टैंक्स। [संगीत] यह टैंक्स एलिमेंट के अंदर छिपे होते हैं। एलिमेंट को आईवी के साथ सिक्योरली कनेक्ट करने के बाद इंजीनियर्स [संगीत] इन कंक्रीट बैलेंस टैंक्स को भरना शुरू करते हैं। अब एलिमेंट काफी भारी हो जाता है और इसकी पॉजिटिव बॉयसी खत्म हो जाती है। लेकिन आईवी के साथ इसका कनेक्शन यह सुनिश्चित [संगीत] करता है कि एलिमेंट फिर भी पानी पर फ्लोट करता रहे। अब आईवी और इस विशाल एलिमेंट की लंबी जर्नी इमर्शन साइट [संगीत] की तरफ शुरू होती है। जहां वे इस टनल एलिमेंट को समुद्र की तलटी सी बेड पर इंस्टॉल करने वाले हैं।

इन टनल एलिमेंट्स को प्लेस करने के लिए सबसे पहले सी बेड को तैयार करना पड़ता है। सी बेड को एक परफेक्ट ट्रपिजोइडल शेप में एक्सकवेट करना होता है और इसके नीचे एक अच्छी तरह तैयार किया गया फाउंडेशन होना जरूरी है।

लेकिन सवाल यह है कि इंजीनियर्स ने गहरे समुद्र के अंदर यह काम कैसे किया? यह विशाल ड्रैगर्स इस टनलिंग प्रोजेक्ट का सबसे क्रूशियल काम कर रहे हैं। यह भारी भरकम टनल एलिमेंट्स को प्लेस करने के लिए सी बेड को तैयार कर रहे हैं। इस काम के लिए क्लम शेल ड्रेजर्स का इस्तेमाल किया जाता है। ज्यादातर मटेरियल को एक्सकवेट किया गया द ट्रेलिंग सेक्शन हॉपर ड्रेजर की मदद से। यह ड्रेजर्स सेडिमेंट को हटाते हैं और सी बेड को एक ट्रपीजोइडल शेप में तैयार करते हैं। इसके बाद ट्रच के अंदर ग्रेवल जैसे ग्रन्यूलर मटेरियल की एक लेयर बिछाई जाती है ताकि टनल को रखने के लिए एक स्मूथ लेवल और मजबूत सरफेस तैयार हो सके।

जिस टनल एलिमेंट का इनोगेशन किंग फ्रेडरिक एक्स ने किया था उसे सफलतापूर्वक 6 मई 2026 को इमर्स किया गया। इस इमर्शन प्रोसेस को पूरा होने में लगभग 14 घंटे लगे। पूरे इमर्शन प्रोसेस पर आईवी का पूरा कंट्रोल था। यहां तक कि पोंट को भी सी बेड से एंकर किया गया था। जब एलिमेंट को सही पोजीशन के ऊपर पूरी तरह अलाइन कर लिया जाता है तो इंजीनियर्स स्ट्रैंड जैक्स को एक्टिवेट करके एलिमेंट को नीचे उतारते हैं। ध्यान रखिए इस स्टेज पर एलिमेंट अब बोंट नहीं रहता है। इसके बाद प्रिसाइज एलाइनमेंट के लिए मोरिंग रोप्स का इस्तेमाल किया जाता है। जिसके बारे में हम पहले समझ चुके हैं। स्टैंडर्ड टनल एलिमेंट्स का एक्चुअल इमर्शन प्रोसेस लगभग 2 साल डिले हुआ था। इसकी वजह टेक्निकल चैलेंजेस और स्पेशली डिज़ इमर्शन वेसल आईवी की टेस्टिंग रिक्वायरमेंट्स थी।

यह एनिमेशन दिखाता है कि अलग-अलग टनल एलिमेंट्स को कैसे जोड़ा जाएगा और टनल का कंस्ट्रक्शन किस तरह आगे बढ़ेगा। इस एनिमेशन में आप स्पेशल एलिमेंट्स को भी देख सकते हैं। जिस टनल टेक्नोलॉजी को हमने अभी समझा है, उसे इमर्स ट्यूब टनल कहा जाता है।

फेमन बेल्ट टनल असल में स्कैनमेट कॉरिडोर का एक मिसिंग लिंक है। अभी कोपनहेगन से हम तक ट्रेन जर्नी में लगभग 4.5 से 5 आवर्स लगते हैं। लेकिन जब यह टनल पूरी तरह तैयार हो जाएगा तो यही ट्रैवल टाइम घटकर सिर्फ 2.5 घंटे रह जाएगा। यह मिसिंग लिंक देखने में छोटा लगता है। है ना?

फिलहाल इस हिस्से में फेरीस चलती है। फेरी से यह सफर पूरा करने में लगभग 45 से 60 मिनट लगते हैं। इसके अलावा फेरी टर्मिनल पर चेक इन और वेटिंग के लिए एक्स्ट्रा 15 से 30 मिनट भी लग जाते हैं। लेकिन फहमान बेल्ट फिक्स लिंक बनने के बाद यही ट्रैवल टाइम घटकर कार से सिर्फ 10 मिनट्स और ट्रेन से केवल 7 मिनट्स रह जाएगा।

अब आपके मन में यह सवाल आ सकता है कि इंजीनियर्स ने इस मिसिंग लिंक को पूरा करने के लिए ब्रिज ऑप्शन क्यों नहीं चुना? असल में सबसे पहला प्रपोजल एक ब्रिज का ही था। एक केबल स्टेट ब्रिज अगर इस प्रपोजल को मंजूरी मिल जाती तो यह शानदार केबल स्टेट ब्रिज [संगीत] दुनिया का सबसे लंबा केबल स्टेट ब्रिज बन जाता। लेकिन फिर इस प्रपोजल को रिजेक्ट क्यों किया गया?

फेमन बेल्ट दुनिया के सबसे बिजी शिपिंग लेंस में से एक है। जहां हर साल लगभग 42,000 से 70,000 वेसल ट्रांजिट्स होते हैं। भले ही इंजीनियर्स ब्रिज के लिए एक बहुत बड़ा स्पैन प्रोवाइड कर देते लेकिन शिप्स के टकराने का खतरा एक बड़ी चिंता थी। इसके अलावा ऐसे ब्रिज के लिए लगभग 65 मीटर्स वर्टिकल क्लीयरेंस की जरूरत होती। वहीं एक टनल में नेविगेशन से जुड़ा रिस्क लगभग पूरी तरह खत्म हो जाता है।

एक टनल का एनवायरमेंटल इंपैक्ट एक ब्रिज की तुलना में काफी कम होता है। ब्रिज का लैंडस्केप पर एक परमानेंट फुटप्रिंट रह जाता है। यह सही है कि टनल कंस्ट्रक्शन के लिए समुद्र में एक बहुत बड़ी ट्रेंच को ड्रेच करना पड़ता है। लेकिन इसका इंपैक्ट काफी हद तक टेंपरेरी होता है। समय के साथ नेचर अपने आप इस जगह को फिर से संभाल लेती है।

सबसे इंपॉर्टेंट रीज़न है ग्रेडियंट चैलेंज। आप देख सकते हैं कि ब्रिज का पहला हिस्सा ऊपर की तरफ ग्रेडियंट क्लाइम है। हैवी रेल के मामले में सिर्फ 1% से 1.5% ग्रेडियंट भी काफी सिग्निफिकेंट माना जाता है। क्योंकि ब्रिज को समुद्र के लेवल से कम से कम 65 मीटर्स ऊपर होना पड़ता। इसलिए इसका ग्रेडियंट काफी ज्यादा हो जाता। अगर कोई हैवी फ्रेट ट्रेन इस 1.2% इंक्लाइन वाले ब्रिज पर रुक जाए तो उसे दोबारा स्टार्ट करने के लिए बहुत ज्यादा अट्रैक्टिव एफर्ट की जरूरत होगी। यहां तक कि व्हील स्लिप होने का भी खतरा रहता है। टनल में भी दूसरे हिस्से में ऊपर की तरफ ग्रेडियंट है। लेकिन टनल का सबसे निचला पॉइंट समुद्र के लेवल से सिर्फ 40 मीटर्स नीचे है। इस वजह से टनल में ग्रेडियंट काफी कम रहता है।

अब आपके मन में यह सवाल आ सकता है कि इंजीनियर्स ने चैनल टनल की तरह टीबीएम टनल का ऑप्शन क्यों नहीं चुना? असल में यहां पानी की [संगीत] मैक्सिमम डेप्थ सिर्फ 30 मीटर्स है। इसीलिए टीबीएम टनल बनाने की जरूरत नहीं थी। टीबीएम टनल आमतौर पर ज्यादा गहराई वाले पानी वाले रीजंस [संगीत] के लिए ज्यादा सूटेबल होते हैं। वहीं फेमरन बेल्ट जैसे कम वाटर डेप्थ वाले रीजन में इमर्ज ट्यूब टनल टेक्नोलॉजी एक ज्यादा प्रैक्टिकल सॉल्यूशन है।

आपके मन में एक इंटरेस्टिंग सवाल आ सकता है। इमर्शन के बाद वर्कर्स टनल एलिमेंट के अंदर कैसे एंटर करते हैं? मौजूदा एलिमेंट जियोमेट्री को देखते हुए यह बिल्कुल भी पॉसिबल नहीं है। इसका सॉल्यूशन है पेशेंस। वर्कर्स को इंतजार करना पड़ता है। जब तक टनल एलिमेंट्स आगे बढ़ते हुए इस स्टेज तक नहीं पहुंच जाते। जब टनल एलिमेंट्स आगे बढ़ते हुए पोर्टल तक पहुंच जाते हैं तब वर्कर्स टनल के अंदर प्रवेश कर सकते हैं और बाकी का काम पूरा कर सकते हैं। और हां बीएलआर टी की मदद से वे आसानी से आगे की तरफ प्रोग्रेस कर सकते हैं।

डेनमार्क के रोडबी हॉर्न में स्थित कास्टिंग फैक्ट्री अब सीरियल प्रोडक्शन स्पीड तक पहुंच चुकी है। जहां पहला एलिमेंट कास्ट करने में लगभग एक साल लग गया था। वहीं अब यह फैसिलिटी हर कुछ हफ्तों में एक पूरा टनल एलिमेंट बनाने का लक्ष्य रख रही है। डेनिश प्रोजेक्ट ओनर फेमरन एएस और डेनमार्क व जर्मनी दोनों की गवर्नमेंट्स आधिकारिक रूप से यह कहती है कि टनल को 2029 में ट्रैफिक के लिए ओपन कर दिया जाएगा। इस तारीख को बनाए रखने के लिए रोड बिह फैक्ट्री में कंस्ट्रक्शन वर्क 24 स्लाइड साथ चल रहा है। हालांकि टनल एलिमेंट्स को इमर्स करने की प्रोसेस में एक सेटबार्क आया है। कस्टम मेड इमर्स वेसल हाईवे को टेस्टिंग और अप्रूवल फेस के दौरान लगभग 24 महीने की देरी हुई। कई इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि भले ही टनल स्ट्रक्चर का काम पूरा हो जाए लेकिन ट्रैफिक के लिए कमीशनिंग की तारीख आगे बढ़कर लगभग 2030 तक जा सकती है।

किसी भी तरह जब यह प्रोजेक्ट पूरा हो जाएगा तो फेम बेल्ट टनल दुनिया की सबसे लंबी इमर्स ट्यूब टनल बन जाएगी। यूरोप के लिए एक रेवोल्यूशनरी कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट। अब बस इस टनल के इनोगेशन डे का इंतजार है ताकि हम सभी इसके अंदर से एक शानदार जर्नी का अनुभव कर सकें। मिलते हैं एक नए वीडियो में। अपना ख्याल रखिए। बाय-बाय। तो
Why is there a crowd and celebration behind me? Today, on June 17, 2024 the first tunnel element was completed in the Rudiwant factory, and this is being inaugurated by King Frederik X of Denmark. You can see a tank capsule box near the king. The plan is to bury it near the entrance of Danish side. The tank capsule box contains items such as a coin featuring the King’s image, paintings by local children, and messages from the workers who built the first tunnel element. The tunnel element is absolutely huge, right?


Once the concrete has cured, each end of the tunnel element is sealed with the bulkhead. When the tunnel elements are ready, the basin is flooded with water from the adjacent waterway. These bulkheads ensure the inside of the tunnel element remains dry and air-filled. The concrete segment is designed so that when it is airtight, it floats on water. A clever use of the principle of buoyancy. You might have noted that along with the flooding of the basin, the ballast tanks inside are also partially filled. This is an operation called trimming. Without the trimming, if you directly flood the basin, the element will float, but there is no guarantee it will float straight. With the clever ballast tank filling, the element is floated perfectly straight and also with exact amount of immersion needed. Please note that the weight of one tunnel element is 73,500 tonnes. They cannot be transported via road. Once afloat, the massive tunnel elements are towed out of the basin by tugboats. The element’s top surface is just 30 centimeters above the water's surface. The elements are first towed to the work harbor.

In the work harbour, the hero of the Fehrman belt , IVY is waiting for the tunnel elements. These are custom made pontoons specifically designed for the Fehrman belt project. The first task is to hand over the element to the IVY. Now, it’s time to reveal the next ballast tank of the tunnel element , concrete ballast tanks. They are hidden inside the element. After securing the element with the IVY, engineers fill these concrete ballast tanks. Now, the element is too heavy and no longer positively buoyant, but the connection with IVY will make sure that the element will still float. Now the long journey of the IVY along with the element towards the immersion site starts. They are going to place the tunnel element on the seabed.

To place these tunnel elements, the seabed has to be ready. The seabed needs to be excavated into a perfect trapezoidal shape with a well-prepared foundation. How did the engineers achieve this in the deep ocean?

These huge dredges are performing the most crucial job of the tunneling project. They are preparing the seabed for the placement of the heavy tunnel elements. Clamshell dredgers are used for this purpose. Most of the material was excavated by a trailing suction hopper dredger. They remove sediment and prepare the seabed in a trapezoidal shape. A layer of granular material, such as gravel, is placed in the trench to create a smooth, level and firm surface for the tunnel to rest on.

The tunnel element King Frederik X inaugurated was successfully immersed on 6th May 2026. The immersion took 14 hours to complete. The immersion process was in complete control of IVY. Even the pontoon is anchored to the seabed . Once properly placed above the right position, the engineers lower the element by activating the strand jacks. Please remember, at this stage, the element is no longer buoyant. We know the remaining process of precise alignment using mooring ropes. The actual immersion of the standard elements was delayed by approximately two years. This is due to technical challenges and testing requirements for the Specialized Immersion Iessel, IVY.

This animation illustrates how different tunnel elements will be added and how they progress. You may observe special elements in this animation. The tunnel technology we have just understood is known as the ‘immersed tube tunnel’..

The Fehrman belt tunnel is a missing link in the ScanMed Corridor. Currently the Copenhagen to Hamburg train journey takes 4.5 to 5 hours. When this tunnel is complete this traveling time will reduce to mere 2.5 hours. The missing link looks tiny, right? Currently, ferries are operational in the missing link. Transportation via Ferry takes anywhere from 45 to 60 minutes, plus an additional 15-30 minutes is required for check-in and waiting at the ferry terminal. Post the Fehrman belt fixed link, this travel time will reduce to 10 minutes by car and just 7 minutes by train.

You might be now wondering why the engineers didn’t choose a bridge option to complete the missing link. In fact the very first proposal was a bridge, a cable-stayed bridge. If this proposal was approved, this magnificent cable-stayed bridge would have become the longest cable-stayed bridge in the world. Why was this proposal rejected?

The Fehmarn Belt is one of the world's busiest shipping lanes, with approximately 42,000 to 70,000 vessel transits per year. Even if the engineers provide a massive span for the bridge, a ship collision was a major concern. Moreover such a bridge required a 65-meter vertical clearance. The navigational risk is effectively zero for a tunnel.

The environmental impact of a tunnel is much lower than that of a bridge. A bridge has a permanent footprint on the landscape. It is true that the tunnel construction requires dredging a massive trench, but the impact is largely temporary. Over the years nature will automatically take over.

The most important reason is the gradient challenge. You can see that the first half of the bridge is a gradient climb. In a heavy rail context, even a 1% to 1.5% gradient is considered significant. Since the bridge has to be at least 65 meters above the sea level, the gradient was significant. If a heavy freight train is forced to stop on a 1.2% bridge incline, restarting it requires massive tractive effort, even a chance of wheelslip. The tunnel also has an up gradient in the second half, but the lowest point of the tunnel is just 40 meters below the sea level. This results in much lower gradience.

Now, you might be wondering why the engineers didn’t opt for a TBM tunnel like Channel tunnel. At a maximum water depth of 30 meters there was no need to build a TBM tunnel. TBM tunnels are preferred for higher water depth regions. For a low water depth region like the Fehrman belt, the Immersed tube tunnel technology is the practical solution.

You might have an interesting question in your mind. How do workers enter the tunnel element after the immersion? With the current element geometry it is not at all possible. The trick is patience. The workers have to wait until the elements progress and reach the portal. Now the workers can enter inside the tunnel and do the remaining work. Of course with the the help of BLRT, they can easily progress forward.

The casting factory in Rødbyhavn, Denmark has now reached "serial production" speed. While the first element took nearly a year to cast, the facility is now aiming to produce one full element every few weeks. The Danish project owner, Femern A/S, and both the Danish and German governments officially maintain that the tunnel will open to traffic in 2029. Construction has been running 24/7 at the factory in Rødbyhavn to keep this date viable. The process of immersing the elements has faced a setback. The custom-made immersion vessel IVY, was delayed by approximately 24 months during its testing and approval phase. Many industry experts now suggest that while the tunnel structure might be finished, the commissioning for traffic could shift toward 2030.

Anyway, once complete the Fehmarn belt will be the longest immersed tube tunnel in the world , a revolutionary construction project for Europe. Let’s all wait for the completion of this tunnel and a pleasant journey through it. Before you leave, please don’t forget to check out the website JLCCNC.com for any of your CNC needs. See you in a new video, take care bye bye.

यह वीडियो JAES ई-लर्निंग का हिस्सा है

JAES ई-लर्निंग JAES की अंतरराष्ट्रीय तकनीकी शिक्षा और ज्ञान-साझाकरण परियोजना है।

वीडियो, 3डी एनिमेशन और दृश्य सामग्री के माध्यम से, हम घटकों, मशीनों, संयंत्रों, प्रक्रियाओं, इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकियों की व्याख्या करते हैं, जिनमें ऐसी घटनाएं भी शामिल हैं जिनका सीधे तौर पर निरीक्षण करना मुश्किल है।

यह परियोजना चैनलों के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क और बहुभाषी सामग्री के माध्यम से लाखों लोगों तक पहुंचती है।

यह उन विषयों में से एक है जिनका हम अन्वेषण करते हैं।