एक पेट्रोलियम रिफाइनरी के हार्ट में डिस्टिलेशन कॉलम के अंदर एक दिलचस्प प्रोसेस चल रहा होता है। चैलेंज यह है कि यहां बहुत सारे मिक्स गाइसिंग होती है। हम इन्हें कैसे सेपरेट करें? अगर आप इस प्रॉब्लम का सॉल्यूशन दे पाते हैं तो रॉ क्रूड ऑयल को कई यूज़फुल कंपोनेंट्स में सेपरेट किया जा सकता है। सिंपलीसिटी के लिए मान लेते हैं कि सिर्फ तीन गैसेस है। अब इंजीनियर्स का क्लेवर सॉल्यूशन है कंट्रोल कूलिंग। आईडिया यह है कि टेंपरेचर को धीरे-धीरे रिड्यूस किया जाए। सिर्फ एक गैस के बॉइलिंग पॉइंट तक। ओला। वहीं स्पेसिफिक गैस लिक्विड में कंडेंस हो जाती है और बाकी गैसेस से इंस्टेंटली सेपरेट हो जाती है। नेक्स्ट गैस को आइसोलेट करने के लिए टेंपरेचर को और रिड्यूस कर दीजिए अगले बॉईलिंग पॉइंट तक। लेकिन अगर आप डिस्टिलेशन टावर को जूम करके देखें सरप्राइज। वहां आपको कोई कूलिंग कॉइल्स नहीं दिखेंगी। उसकी जगह आपको गैस सेपरेशन का एक इंजीनियस मेथड दिखेगा। बबल कैप्स का यूज करके डिस्टिलेशन कॉलम की जीनियस इंजीनियरिंग समझने के लिए पहले हमें यह अस्यूम करना होगा कि यह सारी ट्रेज कंडेंस्ड लिक्विड से भरी हुई है। टॉप पर लोएस्ट टेंपरेचर वाला लिक्विड होता है और बॉटम पर हाईएस्ट टेंपरेचर वाला लिक्विड क्रूड ऑयल को सबसे पहले फर्नेस में फीड किया जाता है। यहां ज्यादातर लिक्विड वेपराइज हो जाता है। अब यह फ्लूइड जो मोस्टली वेपर होता है और थोड़ा लिक्विड भी होता है। डिस्टिलेशन कॉलम में एंटर करता है। अस्यूम कीजिए कि फर्स्ट ट्रे पर लिक्विड का टेंपरेचर 370 डिग्री सेल्सियस मेंटेन किया गया है। और जो फ्लूइड एंटर कर रहा है उसका टेंपरेचर 400 डिग्री सेल्सियस है। यहां से सिर्फ वेपर ऊपर की तरफ राइज करता है। अब बबल कैप डिजाइन का मैजिक शुरू होता है। इस डिजाइन की वजह से वेपर पार्टिकल्स को एक स्पेसिफिक पथ फॉलो करना पड़ता है। जो गैस इस ट्यूब के थ्रू एंटर करती है उसे ट्रे में मौजूद लिक्विड के अंदर से पास करना पड़ता है। याद रखिए यह लिक्विड काफी लोअर टेंपरेचर पर होता है। मान लीजिए गैस का एक कंपोनेंट है जिसका बॉइलिंग पॉइंट 375 डिग्री सेल्सियस है। तो ये कंपोनेंट इस लिक्विड पूल के अंदर आते ही कंडेंस हो जाएगा। इसी तरह गैस के सारे कॉमोनेंट्स जिनका बॉइलिंग टेंपरेचर 370 डिग्री सेल्सियस और 400 डिग्री सेल्सियस के बीच है वह सब यही कंडेंस हो जाते हैं। जिन गैसेस का बोइलिंग टेंपरेचर 370 डिग्री सेल्सियस से कम होता है। वह इस लिक्विड पूल से एस्केप कर जाती है और ऊपर की तरफ राइज करती है। यहां उनके लिए अगला लिक्विड पूल वेटिंग में होता है। जिसका टेंपरेचर और भी कम होता है। मान लीजिए 300 डिग्री सेल्सियस। यही प्रोसेस फिर रिपीट होता है और जिन गैसेस का बॉईलिंग पॉइंट 300 डिग्री सेल्सियस से 375 डिग्री सेल्सियस तक होता है वह सब इस लिक्विड पूल में कंडेंस हो जाती है। इसी तरह इंजीनियर्स क्रूड ऑयल को अलग-अलग कॉमोनेंट्स में सेपरेट करते हैं। एक प्रैक्टिकल डिस्टिलेशन टावर में लगभग 15 ऐसी ट्रेस होती है जितना मॉलिक्यूल हैवी होता है। उसका बॉईलिंग पॉइंट उतना ही ज्यादा होता है। इसका मतलब यह है कि क्रूड ऑयल के सारे हैवी कंपोनेंट्स टावर के बॉटम में मिलते हैं और लाइटर कंपोनेंट्स टॉप की तरफ होते हैं। उदाहरण के लिए डिस्टिलेशन टावर के टॉप रीजन में आपको गैसोलिन मिलेगी और बॉटम रीजन में इंडस्ट्रियल फ्यूल ऑयल टावर के बिल्कुल टॉप पर एक कंडेंसर लगाया जाता है। यह एक्टिव कूलिंग के अंडर होता है। जब गैस इन कॉइल से होकर गुजरती है तो उसका कुछ हिस्सा कंडेंस हो जाता है। जो गैस बच जाती है जिसका बॉईलिंग पॉइंट बहुत ही लो होता है। उसे सबसे ऊपर से पेट्रोलियम गैस के रूप में कलेक्ट किया जाता है। दुर्भाग्य से क्रूड ऑयल सेपरेशन की यह इंटरेस्टिंग फिजिक्स इतनी परफेक्टली काम नहीं करती। बॉटम मोस्ट ट्रे को देखिए। थ्योरी के हिसाब से जिन गैसेस का बोइलिंग पॉइंट 370 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा है उन्हें यही कंडेंस होना चाहिए। लेकिन प्रैक्टिकली कुछ गैस मॉलिक्यूल्स जिनका बोइलिंग पॉइंट 370 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा होता है, वह इस तरल पुल से एस्केप कर जाती है और इवेंचुअली टॉप ट्रे तक पहुंच जाती है। जबकि उन्हें वहां होना ही नहीं चाहिए। अब इंजीनियर्स का अगला ट्रिकी सॉल्यूशन आता है। इस तरल को एक पाइप के थ्रू वापस बॉटम ट्रे में भेज दिया जाता है। यह ट्रे हायर टेंपरेचर पर होती है जिससे वह मॉलिक्यूल्स वेपराइज हो जाती है जो एक्चुअली अपर ट्रे में होनी चाहिए और सिर्फ रिक्वायर्ड मॉलिक्यूल्स को ही ट्रैप किया जाता है। इस तरह का सेपरेशन और रिसर्कुलेशन डिस्टिलेशन कॉलम के अंदर कंटीन्यूसली चलता रहता है। अब चलिए डिस्टिलेशन कॉलम के बॉटम में गिरे रेड्यू पर फोकस करते हैं। इस रेजिड्यू में भी कुछ यूज़फुल प्रोडक्ट्स होते हैं। इसमें मौजूद फ्रैक्शंस का बॉइलिंग पॉइंट बहुत ज्यादा होता है। कुछ तो 1000 डिग्री सेल्सियस से भी ऊपर बॉईल होते हैं। लेकिन इतनी हाई टेंपरेचर पर बॉईल होने से पहले ही मॉलिक्यूल्स क्रैक हो जाते हैं। इंजीनियर्स फिर भी रेड्यू के सारे फ्रैक्शंस को बॉईल करना चाहते हैं। लेकिन लोअर टेंपरेचर पर यहां एक इजी एग्जांपल
लेते हैं। नॉर्मली पानी 100 डिग्री सेल्सियस पर बॉईल करता है। लेकिन अगर आप पानी के आसपास का प्रेशर रिड्यूस कर दें तो वही पानी 50° सेल्सियस पर भी बॉईल करने लगता है। यही सेम ट्रिक रेजिड्यू पर अप्लाई की जाती है। डिस्टिलेशन कॉलम का प्रेशर रिड्यूस किया जाता है। इस प्रोसेस को वैक्यूम डिस्टिलेशन कहा जाता है। यहां रेजिड्यू को बहुत लोअर टेंपरेचर पर डिफरेंट फ्रैक्शंस में डिस्टिल किया जाता है। बिना मॉलिक्यूल्स को क्रैक किए वैक्यूम डिस्टिलेशन कॉलम से निकलने वाला लाइटेस्ट फ्रैक्शन कैटलेटिक क्रैकर में जाता है। नेक्स्ट फ्रैक्शन से वैक्स और लुब्रिकेशन ऑयल कलेक्ट किया जाता है। सबसे हैवी फ्रैक्शन लिक्विड ही रहता है जिससे एस्पल्ट और इंडस्ट्रियल फ्यूल बनाए जाते हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि इस टावर के अंदर कंटीन्यूअस वैक्यूम कैसे मेंटेन किया जाता है। इस क्रूशियल जॉब के लिए एक पिकुलर डिवाइस यूज़ होती है। जिसे स्टीम इजेक्टर कहा जाता है। स्टीम इजेक्टर टावर के अंदर लीक होने वाली एयर और नॉन कंडेंसेबल गैसेस को बाहर निकाल देता है। यह डिवाइस वेंचुरी प्रिंसिपल पर काम करती है। जब हाई प्रेशर स्टीम इस थ्रोटलल रीजन तक पहुंचती है तो उसकी स्पीड ड्रास्टिकली बढ़ जाती है। बर्नोलिस प्रिंसिपल के अकॉर्डिंग हाई स्पीड का मतलब लो प्रेशर होता है। स्टीम इजेक्टर का यह लो प्रेशर रीजन एयर और गैसेस को अपने अंदर खींच लेता है और इस तरह टावर के अंदर प्रेशर कास्टेंट नेगेटिव बना रहता है। आपको यह जानकर सरप्राइज होगा कि वैक्यूम डिस्टिलेशन टावर के अंदर मेंटेन किया गया प्रेशर काफी लो होता है। लगभग 10 से 50 मि.मी. ओ ऑफ मरकरी याद रखिए नॉर्मल एटमॉस्फेरिक प्रेशर। 760 मिलमीटर ओ ऑफ मरकरी होता है। क्लियरली इतनी लो प्रेशर पर काम करने के लिए स्पेशल टाइप के हाई परफॉर्मेंस गास्केट्स और सीलिंग सिस्टम्स की जरूरत होती है। अब मिलिए एक मॉडर्न गास्केट से जो कटिंग एज ग्राफाइट टेक्नोलॉजी से बना है ग्राफ आर। ग्राफ आर प्योर एक्सपेंडेड ग्राफाइट से बना होता है। यह फ्लस की माइक्रोस्कोपिक इमपरफेक्शंस के साथ बहुत अच्छी तरह कंफर्म कर जाता है और हाई टेंपरेचर को भी इजीली विथ स्टैंड कर सकता है। जॉइंट्स को एयर टाइट बनाने के लिए कॉमनली स्पायरल वंड गैस्केट्स यूज किए जाते हैं। यहां एक वी शेप मेटल स्ट्रिप को किसी फ्लेक्सिबल मटेरियल 20 थ्रीस के साथ स्पिरली वाउंड किया जाता है। इससे एक रेिलियंट गसेट बनता है जो हाई टेंपरेचर और प्रेशर दोनों को हैंडल कर सकता है। हम ऑलरेडी देख चुके हैं कि मेन डिस्टिलेशन कॉलम से गैसोलिन कैसे प्रोड्यूस होती है। लेकिन अनफॉर्चूनेटली इस गैसोलिन का ऑक्टेन नंबर काफी लो होता है। अगर आप इसे कार्स में यूज करें तो इंजन नॉकिंग की सीरियस प्रॉब्लम्स हो सकती है। लेकिन अगर हम फ्यूल ऑयल को क्रैक करें जो सभी फ्रैक्शंस में सबसे हैवी था। तो हम हाई ऑक्टेन गैसोलिन प्रोड्यूस कर सकते हैं। लेकिन अभी भी हमने रिफाइनरी का सबसे बड़ा मिस्ट्री अनफोल्ड नहीं किया है। डिस्टिलेशन की शुरुआत में हमने एसएम किया था कि ट्रेस लिक्विड पुल से भरी हुई होती है। यह एक्चुअली कैसे किया जाता है? यह एक प्रोसेस से अचीव होता है जिसे प्रीलोडिंग कहा जाता है। इसे प्रीवेटिंग भी कहते हैं। यह प्रोसेस कॉलम के टॉप से लिक्विड को पंप करके की जाती है। यह पंपिंग बहुत स्लोली की जाती है। लिक्विड कॉलम के अंदर नीचे की तरफ फ्लो करता है और एक ट्रे से दूसरी ट्रे में कास्केड होता जाता है। जब तक सारी ट्रेज़ फिल नहीं हो जाती। इससे हर ट्रे पर रिक्वायर्ड लिक्विड होल्ड अप इस्तैब्लिश हो जाता है जो नॉर्मल ऑपरेशन के दौरान प्रॉपर वेपर लिक्विड कांटेक्ट के लिए लिक्विड सील बनाता है। अब वेपराइज क्रूड ऑयल को डिस्टिलेशन कॉलम में इंट्रोड्यूस किया जा सकता है। इसका मतलब यह भी है कि स्टार्टिंग में सारी ट्रेस में लिक्विड सेम होता है। लेकिन यह सिर्फ एक टेंपरेरी स्टेट होती है। जैसे ही वेपराइज क्रूड ऑयल सिस्टम में एंटर करता है। सब कुछ चेंज होना शुरू हो जाता है। कुछ ही मिनट्स के अंदर हर ट्रे में लिक्विड का कंपोजशन यूनिक हो जाता है। क्रूड ऑयल का एक बैरल 169 लीटर का होता है। इंटरेस्टिंग बात यह है कि रिफाइंड प्रोडक्ट्स का टोटल वॉल्यूम लगभग 170 लीटर होता है। यह वॉल्यूम इनक्रीस प्रोसेसिंग गेन की वजह से होता है। हमने डेंस मॉलिक्यूल्स वाले क्रूड ऑयल को लाइटर मॉलिक्यूल्स वाले आउटपुट्स में ब्रेक किया है। इन 170 लीटर में से 73 लीटर गैसोलिन होती है। 43 लीटर अल्ट्रा लो सल्फर डीजल होता है और लगभग 16 लीटर केरोसिन और जेट फ्यूल होता है। बाकी जो स्मॉल प्लेयर्स होते हैं वह इस पिक्चर में दिखाए गए हैं। यह बिल्कुल मैजिक जैसा लगता है। इस रॉ और यूज़लेस क्रूड ऑयल से हमने आखिरकार हाईली वैल्यूुएबल कॉमोनेंट्स प्रोड्यूस कर लिए। यही है फ्रैक्शनल डिस्टिलेशन का मैजिक। अगर आपको यह वीडियो हेल्पफुल लगा तो हमें लाइक और कमेंट करके जरूर बताएं। आप इसे शेयर भी कर सकते हैं और हमारे चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूलें। हमारे अपकमिंग प्रोजेक्ट्स के बारे में जानने के लिए हमारी वेबसाइट jese company.com पर जरूर विजिट करें।

