जमीन के नीचे से वायलेंट इंग्लिश चैनल को क्रॉस करना इंसान के सबसे बड़े इंजीनियरिंग ड्रीम्स में से एक रहा है। यह ड्रीम 1990 में पूरा हुआ जब एक मासिव टनलिंग और सोफिस्टिकेटेड रेलवे सिस्टम तैयार किया गया। लेकिन यह सिंपल टनल ट्रेन मेथड के साथ एक बहुत बड़ा टेक्निकल इशू है। क्या आप उसे स्पॉट कर सकते हैं? समझने के लिए एक एग्जांपल लेते हैं। कुछ डिस्टेंस तक ट्रेन को पुश करने के बाद लड़के को उसे आगे पुश करने में दिक्कत होती है। ऐसा इसलिए क्योंकि कंप्रेस्ड स्प्रिंग ट्रेन को रेजिस्ट कर रही है। सॉल्यूशन क्या है? स्प्रिंग का थोड़ा हिस्सा हटा दो और मैजिकली उसे दोबारा ग्लू कर दो। अब वह फिर से ट्रेन को पुश कर सकता है। ठीक वैसे ही जैसे स्प्रिंग रेजिस्टेंस देती है। जब कोई हाई स्पीड ट्रेन किसी टनल से गुजरती है तो ट्रेन के आगे की हवा कंप्रेस हो जाती है और ट्रेन के खिलाफ बहुत ज्यादा रेजिस्टेंस पैदा करती है। अगर इस कंप्रेस्ड एयर को हैंडल ना किया जाए तो ट्रेन का चलना बहुत मुश्किल हो जाएगा। इसका सॉलशन भी वैसा ही है जैसे हमने कंप्रेस्ड स्प्रिंग हटाई थी। यानी इस कंप्रेस्ड एयर को रिमूव करना। इस कंप्रेस्ड एयर को मैनेज करने की की है 194 पिस्टन रिलीफ डक्ट्स। समुद्र की तार के नीचे से इतनी बड़ी मात्रा में मिट्टी निकालकर यूके को फ्रांस से जोड़ना सुनने में तो आसान काम लगता है। लेकिन असली हालात समझने के लिए हमें मिट्टी का क्रॉस सेक्शन देखना होगा। सोचिए अगर पानी के अत्यधिक दबाव की वजह से तुरंग धंस जाए तो क्या होगा? ऊपर से पानी फौ्टेड लेयर्स के बीच से रास्ता बनाकर अंदर भी आ सकता है। एक डिटेल जियोलॉजिकल स्टडी के बाद इंजीनियर्स ने डिसाइड किया कि ड्रिलिंग चौक माल से की जाए क्योंकि इसमें परमेबिलिटी बहुत कम है और स्टेबिलिटी काफी अच्छी है। समुद्र की तह के नीचे मिट्टी की इन अलग-अलग लेयर्स के ऐसे डिटेल डायग्राम्स मिड 1950 से पहले अवेलेबल नहीं थे। सी बेड की नेचर समझने के लिए इंजीनियर्स को सैकड़ों बोर होल्स ड्रिल करने पड़े और 1950 से 1980 के बीच एक्सटेंसिव जियोफिजिकल सर्वेज किए गए। दिलचस्प बात यह है कि नेपोलियन बोनापार्ट ने फ्रांस और इंग्लैंड को इंग्लिश चैनल के नीचे से जोड़ने वाली एक टनल बनाने का प्लान सबसे पहले सोचा था। यह आईडिया 1802 में नेपोलियन को फॉर्मली प्रेजेंट किया गया था। जब ब्रिटेन और फ्रांस के बीच थोड़े समय के लिए शांति दी। एक टनल जिसमें फोर्स ड्रोन कैरेजेस चलेंगी और रास्ता ऑयल लैंप्स से रोशन होगा। लेकिन 1803 में ब्रिटेन और फ्रांस के बीच फिर से युद्ध शुरू हो गया और यह प्रोजेक्ट जल्दी ही बंद कर दिया गया। अब वक्त है एक रोबोटिक कैटरपिलर से मिलने का। टनल बोरिंग मशीन टीबीएम। हम जल्द ही देखेंगे कि इस मशीन को कैटरपिलर क्यों कहा जाता है। इस मशीन के कटर हेड पर नजर डालिए। इसमें बहुत सारे मजबूत कटिंग टूल्स लगे होते हैं। कटर हेड पर आपको कुछ पोर्ट होल्स भी दिखेंगे। हाइड्रोलिक पिस्टंस यह सुनिश्चित करते हैं कि कटर हेड को जमीन के खिलाफ हाई प्रेशर से प्रेस किया जाए। फिर कटरहेड घूमना शुरू करता है। एक्सकवेटेड मटेरियल या मक भी शुरू में कटर हेड के साथ घूमता है। लेकिन उसके पास जाने का कोई और रास्ता नहीं होता। सिवाय कटरहेड के पोर्ट होल्स के अंदर। धीरे-धीरे मग मिक्सिंग चेंबर में भरने लगता है। यहां एक स्क्रू कन्वेयर लगा होता है जो मग को बाहर ट्रांसपोर्ट करता है। ध्यान दें कि इन पिस्टंस की एक फिक्स्ड स्ट्रोक लेंथ होती है। कटरहेड को आगे बढ़ाना, रॉक को तोड़ना और रिजल्टिंग मूव को निकालना। यह तीनों काम एक साथ होते हैं। जब एक स्ट्रोक पूरा हो जाता है तो मशीन इस पोजीशन तक पहुंच जाती है। उसके बाद टीबीएम प्रीकास्ट कॉनकरिंग्स की असेंबली शुरू करता है। असेंबली पूरा होने के बाद हाइड्रोलिक पिस्टंस इन कंक्रीट रिंग से जुड़ जाते हैं और टीबीएम अगला साइकिल शुरू करता है बोरिंग और मक रिमूवल का। इस मशीन की मूवमेंट बिल्कुल एक कैटरपिलर जैसी लगती है। है ना? इन विशाल मशीनंस को पूरी तरह असेंबल्ड हालत में ट्रांसपोर्ट करना पॉसिबल नहीं था। इसलिए इन्हें हिस्सों में अलग-अलग ट्रांसपोर्ट किया गया और फिर साइट पर जाकर असेंबल किया गया। टीबी एम्स को द रॉबिंस कंपनी और कावासाकी हैवी इंडस्ट्रीज ने मैन्युफैक्चर किया था। इन बड़े-बड़े पार्ट्स को यूके में डवर के पास शेक्सपियर क्लिफ और फ्रांस में संगते साइट्स पर असेंबल किया गया। दोनों जगहों पर टनल पोर्टल्स के पास मसिव अंडरग्राउंड कार्बं्स या लार्ज ओपन कट एरियाज बनाए गए थे जिन्हें असेंबली हॉल्स के तौर पर इस्तेमाल किया गया। यह लॉन्च चेंबर्स इतने बड़े होने चाहिए थे कि पूरे टीबीएम की लेंथ उनमें कंफर्टेबली आ सके। लॉन्च चेंबर के अंदर जो काम होता था वह प्रसीजन और एक्सपर्टीज का बेहतरीन एग्जांपल था। इंजीनियर्स और टेक्नशियंस की एक स्किल टीम कई हफ्तों तक मिलकर एक टीबीएम को असेंबल करती थी। पूरी तरह असेंबल और टेस्ट होने के बाद टीबीएम तैयार हो जाता था। अपनी लंबी और धीमी जर्नी शुरू करने के लिए। इंग्लिश चैनल के नीचे धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए। चैनल टनल प्रोजेक्ट के लिए तीन टनल्स की जरूरत थी। दो मेन टनल्स और एक सर्विस टनल। हमने पहले ही मेन टनल्स के बीच पिस्टन रिलीफ वाल्व्स देखे हैं। अब इन क्रॉस पासेजेस पर नजर डालिए। किसी भी मेन टनल मेंटेनेंस वर्क के लिए सर्विस पर्सनल पहले सर्विस टनल में एंट्री करते हैं और फिर इन क्रॉस पासेजेस से होते हुए मेन टनल तक पहुंचते हैं। जैसा कि हमने पहले डिस्कस किया था इंजीनियर्स के लिए एक कंसिस्टेंट चॉक लेयर का डिस्कवरी बहुत बड़ी राहत थी। TBMS इसके थ्रू आसानी से पेनिट्रेट कर सकते थे। लेकिन इस लेयर का शेप देखिए। TBMS को इस लेयर के बीच से बिल्कुल सही तरीके से गुजरना था। और अंत में मिडिल में मिलना था। बिना किसी सिग्निफिकेंट ऑफसेट के अगर टनल्स ऑफसेट के साथ मिलते तो प्रोजेक्ट एक डिजास्टर बन जाता। तो TBMS इतना कॉम्प्लिकेटेड कोर्स कैसे मेंटेन कर सकते थे? याद रखिए इतनी डेप्थ पर सेटेलाइट मैपिंग जैसे जीपीएस काम नहीं करेगा। इसके लिए इंजीनियर्स को सबसे पहले सी बेड के नीचे एक पाथ क्रिएट करना पड़ा जिसके नोन कोऑर्डिनेट्स हो यानी टनल एक्सिस लाइन जिसे टीबीएम को स्ट्रिक्टली फॉलो करना था। इसके लिए चैनल टनल के क्लेवर सर्वेइंग टेक्निक्स और लेजर गाइडेंस सिस्टम का इस्तेमाल किया गया। प्राइमरी सर्वेइंग का मेन काम था एक सिंगल यूनिफाइड ग्रिड सिस्टम बनाना जो ब्रिटिश और फ्रेंच कोस्ट्स को कनेक्ट करें। टनलिंग शुरू करने से पहले सर्वेयर्स को यह पता होना चाहिए था कि फोल्कस्टोन यूके के स्टार्टिंग पॉइंट और सांगते फ्रांस के स्टार्टिंग पॉइंट के बीच प्रिसाइज थ्री डायमेंशनल रिलेशनशिप क्या है। सात दिन में आप फ्रांस से इंग्लैंड देख सकते हैं। सर्वेयर्स ने शुरुआत में ट्रेडिशनल ट्रायंगुलेशन टेक्निक्स का इस्तेमाल किया और इंग्लिश चैनल में इंटरलॉकिंग ट्रायंगल्स का एक वेब बनाया। उन्होंने डबर की क्लिप्स के हाई पॉइंट से कॉलेज कॉस्ट के पॉइंट्स तक एंगल्स मेजर्स किए। लेकिन डिस्टेंस इतना ज्यादा था कि वाटर के ऊपर डायरेक्ट मेजरमेंट से हाई एक्यूरेसी हासिल करना मुश्किल था। चैनल को रिक्वायर्ड एक्यूरेसी के साथ ब्रिज करने के लिए उन्होंने हाई प्रेसीजन इलेक्ट्रोमैग्नेटिक डिस्टेंस मेजरमेंट इंस्ट्रूमेंट्स का इस्तेमाल किया। यह टू स्लाइड या माइक्रोवेव बीम्स भेजते थे जो ऑपोजिट कोस्ट पर रिफ्लेक्टर से रिफ्लेक्ट होकर डिस्टेंस को पिन पॉइंट एक्यूरेसी के साथ मेजर करते थे। जीपीएस के आने से सरफेस सर्वेइंग और आसान हो गई और इससे उनके प्रीवियस मेजरमेंट्स भी कंफर्म हुए। इस नॉन कोऑर्डिनेट प्लेन पर इंजीनियर्स कुछ पॉइंट सेलेक्ट करके टनल के लिए इनिशियल बेस लाइन क्रिएट कर सकते थे। सरफेस ग्रिड लॉक होने के बाद अगला स्टेप था सर्वेइिंग को ओशन के नीचे ले जाना। इस टास्क के लिए इस्तेमाल की गई टेक्निक को शाफ्ट प्लंबिंग कहते हैं। शाफ्ट प्लंबिंग ने सरफेस लेवल सर्वे कोऑर्डिनेट्स को एक्यूरेटली सी बेड तक ट्रांसफर किया। यह एक स्पेशलाइज सर्वेइंग इंस्ट्रूमेंट जिसे जीनेथ प्लमेट कहते हैं। उसे बोथ प्रसीजन के साथ शाफ्ट के टॉप पर मौजूद एक नॉन सर्वे पॉइंट के ऊपर सेटअप किया गया। यह इंस्ट्रूमेंट परफेक्टली ऊपर या नीचे देखने के लिए डिजाइन किया गया है। इसके ट्यूब ने प्लमेट को हवा की करंट से आइसोलेट किया। चैनल टनल के लिए ऑप्टिकल प्लमेट्स भी यूज किए गए। शाफ्ट के बॉटम पर एक और प्लमेट होता है जो परफेक्टली ऊपर देखता है ताकि सरफेस से आने वाली लासर या वायर्स के साथ अलाइन किया जा सके। जब यह अलाइनमेंट अचीव हो जाती है तो शाफ्ट के बॉटम का वो स्पॉट सी बेड पर नया कोऑर्डिनेट बन जाता है। डिटेल्ड जियोफिजिकल सर्वे से इंजीनियर्स को चौक माल की डेप्थ पता थी। इन दोनों इंफॉर्मेशन को कंबाइन करके इंजीनियर्स ने टनल एक्सेस एस्टैब्लिश किया। जिस पर कई कोऑर्डिनेट्स रखे गए। अभी सवाल यह था कि टीबीएमएस को इस टनल एक्सिस के साथ कैसे चलाया जाए? यही वह जगह है जहां चैनल टनल प्रोजेक्ट की सबसे स्मार्ट तकनीकों में से एक काम आई। टीबीएम के लिए लेजर गाइडेंस सिस्टम। टनल के अंदर टीबीएम के पीछे एक लेजर थियोडोलिट माउंट किया गया। इसके अलावा टनल वॉल पर कुछ कंट्रोल पॉइंट्स भी लगाए गए। थियोडोलिट और कंट्रोल पॉइंट्स के कोऑर्डिनेट इंजीनियर को पहले से पता थे। टीबीएम के फ्रेम पर एक फोटोसेंसिव टारगेट माउंटेड किया गया था। इसकी पोजीशन भी मालूम थी। मान लीजिए कि कुछ मीटर आगे बढ़ने के बाद टीबीएम को टनल एक्सिस के साथ एलाइन करना था। कंट्रोल पॉइंट्स इस तरह इंग्रेड थे कि परफेक्ट एलाइनमेंट पर लेजर एग्जैक्टली टारगेट के सेंटर पर पड़ता। लेकिन अगर ड्राइवर ने आगे बढ़ते
समय सही स्टीयरिंग नहीं किया तो ऑब्वियसली लेजर टारगेट के सेंटर से ऑफ पड़ जाएगा। ड्राइवर के कंट्रोल कैबिन में लगी कंप्यूटर सिस्टम तुरंत उसे इस एरर की जानकारी देती और वह करेक्टिव एक्शन ले सकता था। जैसे-जैसे टीबीएम आगे बढ़ता लेजर स्टेशन को पेरियोस की टीबीएम के आगे ले जाया जाता और नए एस्टैब्लिश्ड कंट्रोल पॉइंट्स के साथ एडजस्ट किया जाता। यह पेंस टेकिंग प्रोसेस यह सुनिश्चित करता था कि टीबीएम का पाथ कभी मास्टर प्लान से डेविएट ना करें। हालांकि चौक माल में ड्रिलिंग करना आसान था। लेकिन इस लेयर के अंदर फिशर्स बहुत डेंजरस थे। हैवी हाइड्रोस्टेटिक प्रेशर में टनल का कोलैप्स होने पर ह्यूमन लाइफ्स खतरे में पड़ती और टीबीएम्स हमेशा के लिए ट्रैप्ड हो सकते थे। यह इंजीनियर्स कभी भी होने नहीं देना चाहते थे। सॉल्यूशन था ड्रिलिंग शुरू करने से पहले सोइल को मजबूत करना। ग्राउटिंग सोइल को मजबूत करने का सबसे अच्छा तरीका था। टीबीएम्स में इस कैपेबिलिटी थी कि वे टनल फेस से आगे प्रोब होल्स ड्रिल कर सके। यह होल्स टीबीएम के आगे 100 मीटर या कभी-कभी 250 मीटर तक एक्सटेंड कर सकते थे। अगर प्रोब ड्रिलिंग से अनफेवरेबल कंडीशंस पता चलती तो ग्राउंड इन प्रोब होल्स के थ्रू इंजेक्ट किया जाता। इससे ग्राउंड इफेक्टिवली कंसोलिडेट होता, परमीएबिलिटी कम होती और चॉक लेयर फिजिकली टीबीएम के बोर करने से पहले मजबूत हो जाती। यहां आपके लिए एक ब्रेन टीज़ है। इंजीनियर्स ने मेन टनल से पहले सर्विस टनल ड्रिल किया। क्या आप बता सकते हैं कि मेन टनल्स के लिए ग्राउटिंग कैसे किया गया? इस इमेज में सब दिखाया गया है। सर्विस टनल पहले से ड्रिल किया हुआ था और इन रेडियल ड्रिल्स के माध्यम से मेन टनल्स के लिए ग्राउटिंग आसानी से किया जा सकता था। एक्सटेंसिव जियोलॉजिकल सर्वेस के बावजूद इंग्लिश चैनल के नीचे की प्रिसाइज ग्राउंड कंडीशंस केवल डायरेक्ट एक्सकवेशन से ही पूरी तरह समझी जा सकती थी। सर्विस टनल को पहले ड्रिल करके इंजीनियर्स ने रिस्क को मेडिगिटेट किया और मेन टनल की ग्रूटिंग भी आसान हो गई। इन स्मार्ट इंजीनियरिंग टेक्निक्स की मदद से दोनों टीवीएम्स सही कोर्स पर आगे बढ़ रहे थे। लेकिन जब दोनों मशीनंस 100 मीटर की दूरी पर आए तो दोनों ने हल्ट कर दिया। उस समय केवल एक मशीन आगे ड्रिल कर रही थी। इंजीनियर्स ने ऐसा क्यों किया? इस टेक्निक को सॉफ्ट डॉकिंग कहते हैं। दोनों टीबीएम्स को उनके आखिरी मीटिंग पॉइंट तक ऑपरेट करना जाहिर तौर से सुरक्षित तरीका नहीं था। एक और समस्या थी मिसअलाइनमेंट होने की संभावना। सॉफ्ट डॉकिंग का पहला स्टेप था इंग्लिश साइड से फ्रेंच साइड तक एक नैरो 5 सें.
मी. डायमीटर प्रोब ड्रिल करना। यह टास्क सफलतापूर्वक 30 अक्टूबर 1990 को पूरा हुआ। इससे कंफर्म हुआ कि टनल्स की अलाइनमेंट्स सही है। इंजीनियर्स के लिए यह एक बड़ी राहत थी। प्रोब की सफलता के बाद रिमेनिंग डिस्टेंस के लिए एक स्मॉल पायलट टनल हाथ से एक्सकवेट किया गया। इससे हिस्टोरिक हैंडशेक मोमेंट संभव हुआ 1 दिसंबर 1990 को जब ब्रिटिश और फ्रेंच वर्कर्स पहली बार इंग्लिश चैनल के नीचे मिले। यह हैंडशेक उस समय का प्रतीक था जब पहली बार ग्रेट ब्रिटेन और मेनलैंड यूरोप के बीच लैंड कनेक्शन मौजूद हुआ। पिछली आईसीएज के बाद अंत में फ्रेंच टीबीएम को सावधानी से आगे बढ़ाया गया और रिमेनिंग ग्राउंड को ब्रेक किया जिससे मेन सर्विस टनल एक्सकवेशन पूरी हुई। यही फाइनल मशीन ब्रेक थ्रू था। अगर आप सोच रहे हैं कि यही चैनल टनल की फाइनल ज्योमेट्री है तो आप गलत थे। असल में इंजीनियर्स ने एक और भी कॉम्प्लिकेटेड डिजाइन अपनाया। दो क्रॉसओवर्स वाला डिजाइन। ऐसा क्यों किया गया? यह क्रॉसओवर्स इफेक्टिवली 50.
5 कि.मी. की सुरंग को छह मैनेजेबल सेक्शंस में डिवाइड कर देते हैं। इससे क्या फायदा होता है? टनल के किसी एक सेक्शन में मेंटेनेंस वर्क किया जा सकता है और ट्रेंस को क्रॉसओवर के माध्यम से दूसरी टनल में डायवर्ट किया जा सकता है। इससे सिस्टम का एक बड़ा हिस्सा लगातार ऑपरेशनल रह सकता है। अगर किसी रनिंग टनल में कोई इंसिडेंट या ऑब्स्ट्रक्शन हो जाए तो क्रॉसओवर्स ट्रैफिक को रीूट करने की सुविधा देते हैं। जिससे सर्विज में डिसरप्शन मिनिमम रहती है। आपने शायद चैनल टनल के शेक्सपियर क्लिफ पर यह बड़े एक्सियल फैंस देखे होंगे। यह किस लिए है? यह टनल में फ्रेश एयर सप्लाई के लिए है। टनल के दोनों एंड्स पर सर्विस टनल में फ्रेश एयर सप्लाई की जाती है। सर्विस टनल का एयर प्रेशर मेन टनल से थोड़ा ज्यादा रखा जाता है। यह फ्रेश एयर फिर कंट्रोलोल्ड लवर्स और क्रॉस पैसेजेस में लगे डोर्स के माध्यम से मेन रनिंग टनल्स में फ्लो करती है। क्रॉस पैसेजेस सर्विस टनल को मेन रनिंग टनल्स से हर 375 मीटर पर जोड़ते हैं। इन पैसेजेस में ऐसे डोर्स लगे होते हैं जिन्हें खोल या बंद करके एयर फ्लो को कंट्रोल किया जा सकता है। इस प्रोजेक्ट के लिए कुल 11 टीबीएम्स इस्तेमाल किए गए। फ्रेंच साइड से पांच और इंग्लिश साइड से छह। थरेटिकली इस प्रोजेक्ट के लिए केवल छह टीबीएम्स पर्याप्त थे। एक्स्ट्रा पांच टीबीएम्स इस्तेमाल करने का रीजन था डिफरेंट जियोलॉजिकल कंडीशंस। लैंड पर कोस्ट और टनल स्टार्टिंग पॉइंट्स के बीच की जियोलॉजी डीप सी चौक से अलग और ज्यादा कॉम्प्लेक्स थी। इन सेक्शंस के लिए वही टीबीएम्स इस्तेमाल करना फिजिबल नहीं था। लैंड टनलिंग के लिए यूके साइड पर तीन अलग टीबीएम्स और फ्रेंच साइड पर दो टीबीएम्स यूज किए गए। हैरत की बात यह है कि इन 11 मशीनों में से दो ने एक तरह से कंप्लीट सुसाइड कर दिया। मेरा मतलब है कि इन्हें जानबूझकर रॉक में ड्राइव करके बरी कर दिया गया जिसे अक्सर टीबीएम ब्यूरियल प्रोड्यूर कहा जाता है। दोनों ही ब्रिटिश टीबीएम्स थी। टीबीएम्स पीछे नहीं चल सकते। इतनी दूर से इन मशीनंस को डिस्मेंटल और ट्रांसपोर्ट करना बहुत मुश्किल और कॉस्टली काम था। पांच लैंड बेस्ड टीबीएम्स को पूरी तरह डिस्मेंटल करके रिमूव किया गया। बाकी चार को डिस्मेंटल किया गया और केवल वैलुएबल कंपोनेंट्स को ही सेल्वेज किया गया। क्या आपने टनल के अंदर यह पाइप्स देखे हैं? यह किस लिए है? ट्रेंस एयर फ्रिक्शन की वजह से हीट जनरेट करती है। ओपन में चलने वाली ट्रेंस के लिए यह हीट आसानी से डिसीपेट हो जाती है। लेकिन टनल के अंदर ट्रेंस के लिए हीट के पास निकलने की कोई जगह नहीं होती। अगर यह हीट एक्यूमुलेट हो जाए तो हाई टेंपरेचर सिस्टम में मैकेनिकल प्रॉब्लम्स भी पैदा कर सकती है। यह पाइप्स चिल्ड वाटर कैरी करती है और कंटीन्यूअसली हीट को अब्सॉर्ब करती है। इस तरह इंजीनियर सिस्टम का सेफ टेंपरेचर 25° सेल्सियस बनाए रखने में सक्षम रहते हैं। आइए चैनल टनल में एक वर्चुअल ट्रेन जर्नी करें और इस इंजीनियरिंग मार्वल को और डिटेल में समझें। ट्रेन फ्रेंच साइड के कोकेली से चैनल टनल में एंटर करती है। यह लोकेशन इंग्लिश चैनल कोस्ट से लगभग 6 कि.
मी. इनलैंड है। आप महसूस कर सकते हैं कि ट्रेन सीधे चल रही है। लेकिन असल में यह चौक मॉल लेयर के भीतर एक कॉम्प्लेक्स पाथ फॉलो करती है। हमने पहले ही पिस्टन रिलीफ डेक्स का इस्तेमाल देखा है। टनल एंट्रेंस से 12 कि.मी. ट्रैवल करने के बाद आप पहले रेल क्रॉसओवर से मिलेंगे। यह रीजन असल में एक मासिव अंडरसी कावन है। मान लीजिए कि आपकी ट्रेन को टेक्निकल प्रॉब्लम का सामना करना पड़ता है। थैंक्स टू दो क्रॉसओवर्स जो टनल को छह सेक्शंस में डिवाइड करते हैं। चैनल टनल सर्विस फिर भी जारी रहती है। इस समय एक स्पेशलाइज मेंटेनेंस व्हीकल टनल में एंटर करता है। सर्विस टनल में लगा रोबस्ट गेट खुलता है। इनक्रॉस पैसेजेस के माध्यम से मेंटेनेंस पर्सनल रनिंग टनल में एंटर कर सकते हैं। ध्यान दें कि सर्विस टनल का प्रेशर मेन टनल से अधिक रखा जाता है। अगर रनिंग टनल में फायर हो जाए तो यह हायर प्रेशर सुनिश्चित करता है कि स्मोक और फायर सर्विस टनल में ना फैले। इस तरह यह सेफ इवाकुएशन रूट के रूप में भी काम करता है। रिपेयर वर्क के बाद ट्रेन अपनी जर्नी रिज्यूम करती है। ट्रेन इंग्लिश साइड के फोरकिस्टन कट में चैनल टनल से बाहर निकलती है और अंततः यूके टर्मिनल पहुंचती है। अगले सर्विस के लिए ट्रेन को टर्न अराउंड करना पड़ता है और फिर यह फ्रांस की रिटर्न सर्विस के लिए तैयार हो जाती है। अगर आपको यह वीडियो हेल्पफुल लगा तो हमें लाइक और कमेंट करके जरूर बताएं। आप इसे शेयर भी कर सकते हैं और हमारे चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूलें। हमारे अपकमिंग प्रोजेक्ट्स के बारे में जानने के लिए हमारी वेबसाइट jese company.com पर जरूर विजिट करें।
मी. डायमीटर प्रोब ड्रिल करना। यह टास्क सफलतापूर्वक 30 अक्टूबर 1990 को पूरा हुआ। इससे कंफर्म हुआ कि टनल्स की अलाइनमेंट्स सही है। इंजीनियर्स के लिए यह एक बड़ी राहत थी। प्रोब की सफलता के बाद रिमेनिंग डिस्टेंस के लिए एक स्मॉल पायलट टनल हाथ से एक्सकवेट किया गया। इससे हिस्टोरिक हैंडशेक मोमेंट संभव हुआ 1 दिसंबर 1990 को जब ब्रिटिश और फ्रेंच वर्कर्स पहली बार इंग्लिश चैनल के नीचे मिले। यह हैंडशेक उस समय का प्रतीक था जब पहली बार ग्रेट ब्रिटेन और मेनलैंड यूरोप के बीच लैंड कनेक्शन मौजूद हुआ। पिछली आईसीएज के बाद अंत में फ्रेंच टीबीएम को सावधानी से आगे बढ़ाया गया और रिमेनिंग ग्राउंड को ब्रेक किया जिससे मेन सर्विस टनल एक्सकवेशन पूरी हुई। यही फाइनल मशीन ब्रेक थ्रू था। अगर आप सोच रहे हैं कि यही चैनल टनल की फाइनल ज्योमेट्री है तो आप गलत थे। असल में इंजीनियर्स ने एक और भी कॉम्प्लिकेटेड डिजाइन अपनाया। दो क्रॉसओवर्स वाला डिजाइन। ऐसा क्यों किया गया? यह क्रॉसओवर्स इफेक्टिवली 50.
5 कि.मी. की सुरंग को छह मैनेजेबल सेक्शंस में डिवाइड कर देते हैं। इससे क्या फायदा होता है? टनल के किसी एक सेक्शन में मेंटेनेंस वर्क किया जा सकता है और ट्रेंस को क्रॉसओवर के माध्यम से दूसरी टनल में डायवर्ट किया जा सकता है। इससे सिस्टम का एक बड़ा हिस्सा लगातार ऑपरेशनल रह सकता है। अगर किसी रनिंग टनल में कोई इंसिडेंट या ऑब्स्ट्रक्शन हो जाए तो क्रॉसओवर्स ट्रैफिक को रीूट करने की सुविधा देते हैं। जिससे सर्विज में डिसरप्शन मिनिमम रहती है। आपने शायद चैनल टनल के शेक्सपियर क्लिफ पर यह बड़े एक्सियल फैंस देखे होंगे। यह किस लिए है? यह टनल में फ्रेश एयर सप्लाई के लिए है। टनल के दोनों एंड्स पर सर्विस टनल में फ्रेश एयर सप्लाई की जाती है। सर्विस टनल का एयर प्रेशर मेन टनल से थोड़ा ज्यादा रखा जाता है। यह फ्रेश एयर फिर कंट्रोलोल्ड लवर्स और क्रॉस पैसेजेस में लगे डोर्स के माध्यम से मेन रनिंग टनल्स में फ्लो करती है। क्रॉस पैसेजेस सर्विस टनल को मेन रनिंग टनल्स से हर 375 मीटर पर जोड़ते हैं। इन पैसेजेस में ऐसे डोर्स लगे होते हैं जिन्हें खोल या बंद करके एयर फ्लो को कंट्रोल किया जा सकता है। इस प्रोजेक्ट के लिए कुल 11 टीबीएम्स इस्तेमाल किए गए। फ्रेंच साइड से पांच और इंग्लिश साइड से छह। थरेटिकली इस प्रोजेक्ट के लिए केवल छह टीबीएम्स पर्याप्त थे। एक्स्ट्रा पांच टीबीएम्स इस्तेमाल करने का रीजन था डिफरेंट जियोलॉजिकल कंडीशंस। लैंड पर कोस्ट और टनल स्टार्टिंग पॉइंट्स के बीच की जियोलॉजी डीप सी चौक से अलग और ज्यादा कॉम्प्लेक्स थी। इन सेक्शंस के लिए वही टीबीएम्स इस्तेमाल करना फिजिबल नहीं था। लैंड टनलिंग के लिए यूके साइड पर तीन अलग टीबीएम्स और फ्रेंच साइड पर दो टीबीएम्स यूज किए गए। हैरत की बात यह है कि इन 11 मशीनों में से दो ने एक तरह से कंप्लीट सुसाइड कर दिया। मेरा मतलब है कि इन्हें जानबूझकर रॉक में ड्राइव करके बरी कर दिया गया जिसे अक्सर टीबीएम ब्यूरियल प्रोड्यूर कहा जाता है। दोनों ही ब्रिटिश टीबीएम्स थी। टीबीएम्स पीछे नहीं चल सकते। इतनी दूर से इन मशीनंस को डिस्मेंटल और ट्रांसपोर्ट करना बहुत मुश्किल और कॉस्टली काम था। पांच लैंड बेस्ड टीबीएम्स को पूरी तरह डिस्मेंटल करके रिमूव किया गया। बाकी चार को डिस्मेंटल किया गया और केवल वैलुएबल कंपोनेंट्स को ही सेल्वेज किया गया। क्या आपने टनल के अंदर यह पाइप्स देखे हैं? यह किस लिए है? ट्रेंस एयर फ्रिक्शन की वजह से हीट जनरेट करती है। ओपन में चलने वाली ट्रेंस के लिए यह हीट आसानी से डिसीपेट हो जाती है। लेकिन टनल के अंदर ट्रेंस के लिए हीट के पास निकलने की कोई जगह नहीं होती। अगर यह हीट एक्यूमुलेट हो जाए तो हाई टेंपरेचर सिस्टम में मैकेनिकल प्रॉब्लम्स भी पैदा कर सकती है। यह पाइप्स चिल्ड वाटर कैरी करती है और कंटीन्यूअसली हीट को अब्सॉर्ब करती है। इस तरह इंजीनियर सिस्टम का सेफ टेंपरेचर 25° सेल्सियस बनाए रखने में सक्षम रहते हैं। आइए चैनल टनल में एक वर्चुअल ट्रेन जर्नी करें और इस इंजीनियरिंग मार्वल को और डिटेल में समझें। ट्रेन फ्रेंच साइड के कोकेली से चैनल टनल में एंटर करती है। यह लोकेशन इंग्लिश चैनल कोस्ट से लगभग 6 कि.
मी. इनलैंड है। आप महसूस कर सकते हैं कि ट्रेन सीधे चल रही है। लेकिन असल में यह चौक मॉल लेयर के भीतर एक कॉम्प्लेक्स पाथ फॉलो करती है। हमने पहले ही पिस्टन रिलीफ डेक्स का इस्तेमाल देखा है। टनल एंट्रेंस से 12 कि.मी. ट्रैवल करने के बाद आप पहले रेल क्रॉसओवर से मिलेंगे। यह रीजन असल में एक मासिव अंडरसी कावन है। मान लीजिए कि आपकी ट्रेन को टेक्निकल प्रॉब्लम का सामना करना पड़ता है। थैंक्स टू दो क्रॉसओवर्स जो टनल को छह सेक्शंस में डिवाइड करते हैं। चैनल टनल सर्विस फिर भी जारी रहती है। इस समय एक स्पेशलाइज मेंटेनेंस व्हीकल टनल में एंटर करता है। सर्विस टनल में लगा रोबस्ट गेट खुलता है। इनक्रॉस पैसेजेस के माध्यम से मेंटेनेंस पर्सनल रनिंग टनल में एंटर कर सकते हैं। ध्यान दें कि सर्विस टनल का प्रेशर मेन टनल से अधिक रखा जाता है। अगर रनिंग टनल में फायर हो जाए तो यह हायर प्रेशर सुनिश्चित करता है कि स्मोक और फायर सर्विस टनल में ना फैले। इस तरह यह सेफ इवाकुएशन रूट के रूप में भी काम करता है। रिपेयर वर्क के बाद ट्रेन अपनी जर्नी रिज्यूम करती है। ट्रेन इंग्लिश साइड के फोरकिस्टन कट में चैनल टनल से बाहर निकलती है और अंततः यूके टर्मिनल पहुंचती है। अगले सर्विस के लिए ट्रेन को टर्न अराउंड करना पड़ता है और फिर यह फ्रांस की रिटर्न सर्विस के लिए तैयार हो जाती है। अगर आपको यह वीडियो हेल्पफुल लगा तो हमें लाइक और कमेंट करके जरूर बताएं। आप इसे शेयर भी कर सकते हैं और हमारे चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूलें। हमारे अपकमिंग प्रोजेक्ट्स के बारे में जानने के लिए हमारी वेबसाइट jese company.com पर जरूर विजिट करें।

